piyush kaviraj

feelings and musings…

मैं गरीब गुरबों का ईश

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गरीब गुरबो का ईश

 

 

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एक दिवाली ऐसी भी…


Beautifully written poem.. one can feel the divide created by means and money and the urge to bridge that divide after reading this poem. Good Job @AditiSahu7

Aditi Sahu

Kar  dein roshan! Kar dein roshan!

एक दिवाली ऐसी भी…

मचल रही दिलों में सबके ख़ुशी की एक अजब लहर,
जगमगा उठा हर रास्ता, बूढ़े-बच्चे हुए रोशन चेहरे सभी
इसी सब के दौरान कुछ घरों में मचा है भूख का कहर,
दिवाली हो या ईद, दो-वक़्त की भी रोटी कहाँ नसीब होती कभी!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो दिवाली के दिन नए-नवेले कपडे फबते कुछ बच्चों पर,
रोज़ पांच दिन तक पूजा, छुट्टी और नविन कपडे मनभाते बच्चों को ..
वहीँ बाज़ार में बेचते दिखी एक नन्ही बच्ची फलों से भरी टोकरी रख पर सर,
एक लाचार माँ मांगती दिखी भीक्षा, पास दिखे नग्न अवस्था में बच्चे दो!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो हर घर रौशनी- दिये, आकाशदीप और सीरीज की चमकार,
लगे घर में रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्तों की कतार,
पर अभी भी कुछ कुलों में घुप्प अंधकार, कर पाएं आँगन रोशन
एक ही…

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Aao parosen kuch lamhe is khwabon ki tshtari me


आओ परोसें कुछ लम्हे, इस ख्वाबों की तश्तरी में!!

Spinning a Yarn Of Life

आज बड़े दिनों बाद ज़िन्दगी तुम मिली हो मुझसे
आओ करें कुछ गुफ्तगू
दोपहर की नरम धुप में बैठकर
बुने कुछ गलीचे रंगों से सराबोर
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में
आओ आईने से झांकते अपने ही अक्स में
ढूंढें खुदको या फिर युहीं ख्वाहिशों की
सिलवटों में एक दूसरे को करें महसूस
या फिर याद करें उन भीगी रातों में
जुगनुओं का झिलमिलाना
आओ खोलें खिड़कियां मंन की
हों रूबरू खुदसे
पिरोएँ ख्वाहिशें गजरों में
भरें पींग, छूएं अम्बर को
आओ पूरे करें कुछ अधूरे गीत
छेड़ें कुछ नए तराने
आओ बिताएं कुछ पल साथ
देखें सूरज को पिघलते हुए
इस सुरमयी शाम के साये तले
आओ चुने स्याही में लिपटे सितारे
बनायें इस रात को एक नज़्म
आओ परोसें कुछ लम्हे इस ख्वाबों की तश्तरी में

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The importance of differences in opinion in the evolution of thought


differences in opinion are to ideological evolution what mutation is to genetics! Nicely put forth.. “Just as mutation is necessary for biological evolution, this difference in perception and interpretation is necessary for ideological evolution”.

Reblogged from: http://triformedlamb.wordpress.com/


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Stampede Claims Lives of Patnaites in Dussehra


This Dussehra when people of Patna (Bihar) gathered at Gandhi Maidan to celebrate the festival, the event turned into a tragedy. An unfortunate stampede claimed about 35 lives and left scores injured.

Dussehra is one of the festivals Patnaites wait for every year. The fun and attraction involved with Durga Puja is simply incomparable. Children love it for they get holidays from the sixth day itself, getting time to explore a dazzling and shimmering side of Patna, something which is not available for the rest of the year. The festivities culminate on Vijaya Dashmi or Dussehra with the burning of huge effigies of Meghnaad, Kumbhkaran and Raavan in that order.

About 4 to 5 lakh people assemble at the historic Gandhi Maidan, spread over an area of 62 acres in the shape of a circle, surrounded by busy roads, in the center of the city. The whole of Patna witnesses the grand event, marred by fireworks to commemorate the victory of goodness and ‘dharma’ over evil and ‘adharma’.

The day of Dussehra has always been an eager and anxious wait for evening so that parents would be requested for a visit to ‘Raavan-dahan’ site. It would be an awesome scene with a sea of human beings gleaming in joy. Balloons, roadside chaats and other delicacies like cotton candy would be the added attractions. However, my parents never allowed me to enter inside the Gandhi Maidan during that day.

We would always watch from the other side of the road so that running away could be easy as soon as the human tsunami would erupt after Ravan dahan. We would be extra intelligent to leave as soon as Meghnaad’s effigy was burnt. Reaching home at night and a nice dinner would mark the end of the festivities. A nostalgic sadness would ensue while realizing that another Dussehra has passed.

Who knew a gloomy Dussehra was waiting for Patna this year. By evening, news of stampede was confirmed, with about 35 deaths and more than 100 injured. Sadness engulfed the city, especially for those who have suffered loss of their near and dear ones. Most of the deceased are women or children. The injured have been admitted at Patna Medical College and Hospital (PMCH).

The Prime Minister has already announced a compensation of Rupees two lakh to the nearest kin of the deceased and Rupees fifty thousand to the injured. According to witnesses, a rumor about a live wire led to a panic which resulted into a stampede in no time. Whatever may be the reason it is a horrifying incident which could have been avoided.

It is no secret that lakhs of people assemble at Gandhi Maidan on this day. Besides Dussehra, many rallies and political gatherings, book fairs and other events take place at Gandhi Maidan throughout the year. Yet enough arrangements are never made to avoid emergency situations.

The city administration doesn’t have an SOP for safe evacuation of people during any crisis and as a result, stampedes have been a common feature in the past. The administration needs to be more vigil and better prepared so that such incidents can be avoided in future.

– Piyush Kaviraj

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This article was first published at http://beyondheadlines.in/2014/10/stampede-claims-lives-of-patnaites-in-dussehra/


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अमंगल सोच


सितम्बर का महीना देश के लिए मंगलयान की सफलता के रूप में एक नया और नायाब तोहफा लेकर आया. पूरे देश में हर्ष और उन्माद का वातावरण कई दिनों तक छाया रहा. आखिर पहले प्रयास में और सबसे कम लागत में हमने वो कर दिखाया जो तकनीकी में कहीं आगे, जापान और चीन भी न कर सके. क्या स्कूल, क्या दफ्तर, क्या चपरासी, क्या अफसर! सभी ने इसरो के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर जश्न मनाया.

किन्तु एक खबर ने चौंका कर रख दिया है. सुनने में आया है कि बिहार के मुख्यमंत्री श्री जीतन राम मांझी मधुबनी जिले के एक मंदिर में गए थे. मांझीजी के अनुसार उन्हें बाद में बताया गया कि उनके लौटने के बाद मंदिर और मंदिर में स्थित प्रतिमा की सफाई की गयी ताकि वो फिर से शुद्ध हो सके. ये किस दिशा में जा रहे हैं हम लोग? ऐसा लग रहा है मंगल से वापस धरती पर पटक दिया किसी ने!

पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि श्री मांझी ‘मुसहर’ नामक जाति से हैं. यह जाति बिहार की सबसे पिछड़ी जातियों में से एक है. मांझीजी का मुख्यमंत्री बनना ही इस बात का प्रतीक था कि अब बिहार में भी लोग जाति व्यवस्था से ऊपर उठकर भाईचारे के साथ काम करेंगे. किन्तु पुरातन सामंतवादी सोच लोगों का पीछा ही नहीं छोड़ती. दलित तो पैरों के नीचे ही ठीक है. ऊपर उठ गया तो सवर्णों की साख कम हो जाएगी. उनकी पूछ घट जाएगी. ऐसी बातें कब तक इंसानियत को शर्मसार करती रहेंगी. ऐसी घटनाएं बिहार ही नहीं, अन्य राज्यों में भी होती रहती हैं. किसी भी सभ्य समाज के लिए ऐसी घटनाएँ निंदनीय है.

सोचने योग्य बात यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री के साथ ऐसा व्यवहार हुआ है तो फिर गाँवों में रहने वाले भोले भाले और कमजोर लोगो के साथ किस तरह का बर्ताव हो रहा होगा? दिल दहल उठता है ऐसी परिस्थिति से! क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा समाज बनाना चाहते हैं? क्या हम नहीं चाहते कि भविष्य मेहनत और मेधा के आधार पर तैयार हो! क्या हम नहीं चाहते कि भविष्य खोखले स्तंभों की जगह मजबूत विश्वास और सौहार्द्रता की नींव पर खड़ा हो? अमंगलकारी सोच और बातें किस कदर हमारे मानसिकता में अभी तक घर किये हुए हैं इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है! वहाँ हमारे वैज्ञानिकों ने चाँद को छू लिया, मंगल पर कदम रखने की पूरी तैयारी कर ली है और यहाँ धरती पर दलित, हरिजन, छुआ-छूत, जाति-पाति जैसे अमंगल सोच से भी पीछा नहीं छूट रहा.

पवन श्रीवास्तव नाम के एक युवा निर्देशक दलितों के ऊपर एक चलचित्र बनाने जा रहे हैं. शायद वो समाज के इस अभिशाप से लोगो को अच्छे से रू-ब-रू करा सकें. कुछ वर्षों पहले पटना स्थित महावीर मंदिर में एक दलित को पूजा के लिए नियुक्त किया गया था. कितनी ख़ुशी हुई थी सुनकर कि जाति की जगह महावीर मंदिर ट्रस्ट ने योग्यता पर भरोसा किया और पूरे देश के लिए एक उत्तम उदहारण पेश किया. ऐसा सोचने वाले इतने कम क्यों हैं! फिर भी, उम्मीद पर दुनिया कायम है. आशा है कि मंदिर धोने वाली घटना लाखो में एक हो और एक बुरे सपने की तरह फिर से परेशान न करे.

  • पीयूष कविराज

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– See more at: http://hindi.kohram.in/my-opinion/bad-thinking-for-schedule-caste/#sthash.SBNeYJKJ.dpuf

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http://hindi.kohram.in/my-opinion/bad-thinking-for-schedule-caste/

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