piyush kaviraj

feelings and musings…


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दिग्भ्रम का जाल निकाल कर, सही और सच को तोलिये


राजनीतिक पार्टियों की हवा यूँ चली, मानवता सड़ते देख रहा हूँ।

अपने ही दोस्तों, हमवतनों को आपस में लड़ते देख रहा हूँ।

पार्टियों को सत्ता से मतलब है, यही उनकी शक्ति है,

ये आपको क्या हुआ है, ये किस तरह की भक्ति है।

 

उनके घर चलते रहेंगे, उनके चापलूस इलेक्शन लड़ते रहेंगे,

आप मनमुटाव में जीकर, बस उनका घर भरते रहेंगे।

ये किस तरह का बचपना है, ये हरकतें कितनी बचकानी है,

आज नेता आपका सबकुछ है, ये किस तरह की नादानी है।

 

जो सक्षम है, अमरिका, कनाडा, सिडनी में बस जाएंगे,

आप तालियां ही बजाएंगे? क्या मरते मारते रह जाएंगे?

जिन आंखों को मूंद लिया है, उन आँखों को खोलिये,

दिग्भ्रम का जाल निकाल कर, सही और सच को तोलिये।

— पीयूष कविराज


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काश तुम्हारे पास भी whatsapp होता!


कभी कभी बहुत अकेला हो जाता हूँ

तुम्हारे पास नहीं आ सकता न,

तुम्हारे गोद में सर रख कर रोने के लिए.

समझता ही नहीं, किससे बात करूँ..

काश तुम्हारे पास भी whatsapp होता!

कभी कभी चैट कर लेते, हम माँ-बेटे!!

 

Kabhi kabhi bahut akela ho jata hu.
Tumhare paas nahi aa sakta na,
Tumhare god me sir rakhkar rone ke liye.
Samjhta hi nahi kisse baat karu.
Kaash tumhare paas bhi whatsapp hota!
Kabhi kabhi chat kar lete hum ma-bete!


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ज़िन्दगी ही तो है.. जी लेंगे


ज़िन्दगी ही तो है..
जी लेंगे
कभी पानी की तरह,
कभी ज़हर की तरह
कभी गुस्से के दो घूँट
कभी जाम के दो बूँद,
पी लेंगे.

ज़िन्दगी ही तो है..
जी लेंगे
© पीयूष कविराज


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Blood at Peshawar


I thought I have blood flowing in my veins…..

But blood is flowing out there,

From the veins of the children…..

And we grown ups…..

Can’t even pay a proper homage…..

And we say..

Blood flows through our veins…

Blood is flowing, out there,

On Streets….

Condemning Humanity!!

© 2014 Piyush Kaviraj
The poem can also be found at https://campusdiaries.com/node/28785


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एक दिवाली ऐसी भी…


Beautifully written poem.. one can feel the divide created by means and money and the urge to bridge that divide after reading this poem. Good Job @AditiSahu7

Aditi Sahu

Kar  dein roshan! Kar dein roshan!

एक दिवाली ऐसी भी…

मचल रही दिलों में सबके ख़ुशी की एक अजब लहर,
जगमगा उठा हर रास्ता, बूढ़े-बच्चे हुए रोशन चेहरे सभी
इसी सब के दौरान कुछ घरों में मचा है भूख का कहर,
दिवाली हो या ईद, दो-वक़्त की भी रोटी कहाँ नसीब होती कभी!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो दिवाली के दिन नए-नवेले कपडे फबते कुछ बच्चों पर,
रोज़ पांच दिन तक पूजा, छुट्टी और नविन कपडे मनभाते बच्चों को ..
वहीँ बाज़ार में बेचते दिखी एक नन्ही बच्ची फलों से भरी टोकरी रख पर सर,
एक लाचार माँ मांगती दिखी भीक्षा, पास दिखे नग्न अवस्था में बच्चे दो!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो हर घर रौशनी- दिये, आकाशदीप और सीरीज की चमकार,
लगे घर में रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्तों की कतार,
पर अभी भी कुछ कुलों में घुप्प अंधकार, कर पाएं आँगन रोशन
एक ही…

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