piyush kaviraj

feelings and musings…


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एक दिवाली ऐसी भी…


Beautifully written poem.. one can feel the divide created by means and money and the urge to bridge that divide after reading this poem. Good Job @AditiSahu7

Aditi Sahu

Kar  dein roshan! Kar dein roshan!

एक दिवाली ऐसी भी…

मचल रही दिलों में सबके ख़ुशी की एक अजब लहर,
जगमगा उठा हर रास्ता, बूढ़े-बच्चे हुए रोशन चेहरे सभी
इसी सब के दौरान कुछ घरों में मचा है भूख का कहर,
दिवाली हो या ईद, दो-वक़्त की भी रोटी कहाँ नसीब होती कभी!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो दिवाली के दिन नए-नवेले कपडे फबते कुछ बच्चों पर,
रोज़ पांच दिन तक पूजा, छुट्टी और नविन कपडे मनभाते बच्चों को ..
वहीँ बाज़ार में बेचते दिखी एक नन्ही बच्ची फलों से भरी टोकरी रख पर सर,
एक लाचार माँ मांगती दिखी भीक्षा, पास दिखे नग्न अवस्था में बच्चे दो!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो हर घर रौशनी- दिये, आकाशदीप और सीरीज की चमकार,
लगे घर में रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्तों की कतार,
पर अभी भी कुछ कुलों में घुप्प अंधकार, कर पाएं आँगन रोशन
एक ही…

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अमंगल सोच


सितम्बर का महीना देश के लिए मंगलयान की सफलता के रूप में एक नया और नायाब तोहफा लेकर आया. पूरे देश में हर्ष और उन्माद का वातावरण कई दिनों तक छाया रहा. आखिर पहले प्रयास में और सबसे कम लागत में हमने वो कर दिखाया जो तकनीकी में कहीं आगे, जापान और चीन भी न कर सके. क्या स्कूल, क्या दफ्तर, क्या चपरासी, क्या अफसर! सभी ने इसरो के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर जश्न मनाया.

किन्तु एक खबर ने चौंका कर रख दिया है. सुनने में आया है कि बिहार के मुख्यमंत्री श्री जीतन राम मांझी मधुबनी जिले के एक मंदिर में गए थे. मांझीजी के अनुसार उन्हें बाद में बताया गया कि उनके लौटने के बाद मंदिर और मंदिर में स्थित प्रतिमा की सफाई की गयी ताकि वो फिर से शुद्ध हो सके. ये किस दिशा में जा रहे हैं हम लोग? ऐसा लग रहा है मंगल से वापस धरती पर पटक दिया किसी ने!

पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि श्री मांझी ‘मुसहर’ नामक जाति से हैं. यह जाति बिहार की सबसे पिछड़ी जातियों में से एक है. मांझीजी का मुख्यमंत्री बनना ही इस बात का प्रतीक था कि अब बिहार में भी लोग जाति व्यवस्था से ऊपर उठकर भाईचारे के साथ काम करेंगे. किन्तु पुरातन सामंतवादी सोच लोगों का पीछा ही नहीं छोड़ती. दलित तो पैरों के नीचे ही ठीक है. ऊपर उठ गया तो सवर्णों की साख कम हो जाएगी. उनकी पूछ घट जाएगी. ऐसी बातें कब तक इंसानियत को शर्मसार करती रहेंगी. ऐसी घटनाएं बिहार ही नहीं, अन्य राज्यों में भी होती रहती हैं. किसी भी सभ्य समाज के लिए ऐसी घटनाएँ निंदनीय है.

सोचने योग्य बात यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री के साथ ऐसा व्यवहार हुआ है तो फिर गाँवों में रहने वाले भोले भाले और कमजोर लोगो के साथ किस तरह का बर्ताव हो रहा होगा? दिल दहल उठता है ऐसी परिस्थिति से! क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा समाज बनाना चाहते हैं? क्या हम नहीं चाहते कि भविष्य मेहनत और मेधा के आधार पर तैयार हो! क्या हम नहीं चाहते कि भविष्य खोखले स्तंभों की जगह मजबूत विश्वास और सौहार्द्रता की नींव पर खड़ा हो? अमंगलकारी सोच और बातें किस कदर हमारे मानसिकता में अभी तक घर किये हुए हैं इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है! वहाँ हमारे वैज्ञानिकों ने चाँद को छू लिया, मंगल पर कदम रखने की पूरी तैयारी कर ली है और यहाँ धरती पर दलित, हरिजन, छुआ-छूत, जाति-पाति जैसे अमंगल सोच से भी पीछा नहीं छूट रहा.

पवन श्रीवास्तव नाम के एक युवा निर्देशक दलितों के ऊपर एक चलचित्र बनाने जा रहे हैं. शायद वो समाज के इस अभिशाप से लोगो को अच्छे से रू-ब-रू करा सकें. कुछ वर्षों पहले पटना स्थित महावीर मंदिर में एक दलित को पूजा के लिए नियुक्त किया गया था. कितनी ख़ुशी हुई थी सुनकर कि जाति की जगह महावीर मंदिर ट्रस्ट ने योग्यता पर भरोसा किया और पूरे देश के लिए एक उत्तम उदहारण पेश किया. ऐसा सोचने वाले इतने कम क्यों हैं! फिर भी, उम्मीद पर दुनिया कायम है. आशा है कि मंदिर धोने वाली घटना लाखो में एक हो और एक बुरे सपने की तरह फिर से परेशान न करे.

  • पीयूष कविराज

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– See more at: http://hindi.kohram.in/my-opinion/bad-thinking-for-schedule-caste/#sthash.SBNeYJKJ.dpuf

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http://hindi.kohram.in/my-opinion/bad-thinking-for-schedule-caste/


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What is the shame about?


I have no idea how my friends and peer would react if I have to tell them, while crossing a Pharmacist/general store, that I have to buy a sanitary pad for a female friend or my sister. Its a taboo word which brings nothing less than a wicked smile and a silly sense of embarassment. Menstruation and sanitary pads are sort of forbidden words which can only be ‘whisper’ed, not openly acknowledged or discussed. Prerna .has stayed-free of the pressures of our hypocrite and pseudo-modern society and blogged the following: Well written and Kudos!! I hope this article would serve as an eye-opener to many! Read on…

 

I go to the medical shop and ask for a sanitary Napkin.

First, I myself use a euphemism to a ‘pad’. I then correct myself, and say, bhaiiya Pad chahiye.

Then I think, why didn’t I just call it a pad first? What is wrong with a pad? It does not sound wrong? Why was I so sophisticated about it? I decide, that next time I come, I will call it a pad directly, no euphemisms. I won’t even use the company’s name until the shopkeeper asks my choice.

Then he asked me the company, I told him, Stayfree. He asked me the size. I told him. A friend of mine from college, a male friend came inside the shop. I smiled at him. He  saw me holding the pack of pads. Then he took his pills and went on his way. He did not even talk to me. He was shy that he ‘caught’ me buying pads.

Then the shopkeeper suddenly emerged with a newspaper, and two polythenes. He took a newspaper, wrapped up my pad, then took up a white polythene, and then put the white polythene in the black polythene.

I said, “Bhaiiya, bomb nahi hai. Aur itna plastic waste mat kariye. Charas leke nahi jaa rahi.” ( Bhaiiya, it is not a bomb, and do not waste so much plastic. I am not taking hashish anyway.)

He just looked at me with a confused look. I removed the polythene, and all the cover ups he had given the mighty packet of pads. I was not even carrying a bag. I just took the plain Stayfree packet in my hand, and I WALKED towards home. And by home I mean college. I live in my college.

Sadly the route I took inside college had nobody. Nobody could see what I had done. I just wished somebody saw me with the packet. Because I  bet their reactions would have been priceless- shocked, and flustered.

Why? Why is a packet of pad a matter of shame that it has to be covered up? Why is that it is not simply thought of as medicare? I bleed in a gap of 27 days every month and hell, so did your mother, so does your sister, so does your girlfriend. It is not a matter of shame- it is actually a sign of the health of a woman. Please, I hold hands and I beg of you, not to buy a black polythene covered pad. Just throw it directly in the shopping basket.

And my dad buys sanitary napkin for me, if my mother is unwell and I can’t go out for some reason. Guys, if you are told by your girl-friends, girlfriends, wives, sisters or mothers to buy a pack of pads- do not be ashamed. It is not a matter of shame- it is something a girl needs and it need not be a matter of shame. Please, try and be logical about this. It is not a matter of being flustered. I bleed, I need something to cover it up, and you are buying it, and I am buying, and if you are a seller you are selling it, you don’t have to cover it up under polythenes over polythenes. It just symbolises our society- covered up with hypocrisies and bullshit and whatever is underneath gets lost.

 
 
 
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