piyush kaviraj

feelings and musings…

वो सिर्फ एक लाश नहीं अब (poem for Rohith Vemula)

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वो सिर्फ एक लाश नहीं अब .. पीयूष कविराज.jpg

 

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Indian Premier League: 5 reasons why it is right to call it India ka Tyohar!


It is beyond any doubt that Indian Premier League- the self proclaimed ‘India ka Tyohaar’ (Festival of India) is a success story. It is a money minting tool for the organizers and participating players; at the same time, it is a dose of adrenaline and excitement to the viewers and fans. Though, marred by various controversies, from match-fixing to public brawls, somehow, IPL resurfaces every year with the same fanfare. Let us leave aside the negative aspects for today and focus on the positives it has brought.

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Short-cut to glory

IPL has been a boon to less known or unknown players from different regions. One brilliant knock and a player erupts on the glorious side of fame. Sarfaraz Khan, a 17 year old teenager, hogged the limelight with a single innings of 21-ball 45. It paid off immediately with former England player David Lloyd’s tweet, urging English County teams to rope him in.

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Super entertainment in 40 overs

Whether a CEO tired of enduring corporate pressure or a research scholar who has performed failed experiments throughout the day, all need something to cheer them up by dinner time. IPL takes up that perfect slot with 40 overs of non-stop entertainment. So what if rumors of pre-fixed matches prevail. Who cares! Don’t we enjoy scripted movies and plays? Moreover, the sight of cheerleaders dancing on boundaries does cheer up gloomy faces! A tired person just wants some stress buster at the end of the day. IPL succeeds in doing that.

Image: BCCI

No Infidelity issues!

IPL is great for both – fans and general viewers. We all have one or two favorite players in each team. One can enjoy sixes of Chris Gayle in spite of being a supporter of Rajasthan Royals or Chennai Super Kings. This makes IPL unique. And one can always shift sides and start cheering for the winning team. No hard luck involved and always a win-win situation for viewers like me who stays away from fanatics.

Expanse of cricket infrastructure

With the inclusion of more teams, cricket will expand beyond big cities. This will not only provide more opportunity to local lads, but also lead to development of stadium and other infrastructure needed for the expanse of cricket.

Image: BCCL

Progress of other sports

IPL has shown how money minting and sports revolution can be carried out at the same time. The success of IPL is now being emulated in other sports and games. The success of Pro-Kabaddi and Indian Super League (Football) means that the largely neglected players from sports other than cricket can also be rewarded with money and fame. Such forays into more such games will follow soon.

The article was first published at: Indian Premier League: 5 reasons why it is right to call it India ka Tyohar!.

© piyushKAVIRAJ


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मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं हिंदी मुस्कुराती है- मुनव्वर राना


original source credits: http://www.jankipul.com/2014/12/blog-post_20.html

आज हिंदी के दुःख को उर्दू ने कम कर दिया- कल साहित्य अकादेमी पुरस्कार की घोषणा के बाद किसी मित्र ने कहा. मेरे जैसे हजारों-हजार हिंदी वाले हैं जो मुनव्वर राना को अपने अधिक करीब पाते हैं. हिंदी उर्दू का यही रिश्ता है. हिंदी के अकादेमी पुरस्कार पर फिर चर्चा करेंगे. फिलहाल, मुनव्वर राना की शायरी पर पढ़िए प्रसिद्ध पत्रकार, कवि, लेखक प्रियदर्शन का यह मौजू लेख- प्रभात रंजन

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लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है / मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं और हिंदी मुस्कुराती है,ये मुनव्वर राना हैं- समकालीन उर्दू गज़ल की वह शख़्सियत जिनका जादू हिंदी पाठकों के सिर चढ़कर बोलता है।  हिंदी में उनकी किताबें छापने वाले वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी बताते हैं कि मुनव्वर राना के संग्रह ‘मां’ की एक लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। यही नहीं, हाल में आई उनकी सात किताबों के संस्करण 15 दिन में ख़त्म हो गए। जिस दौर में हिंदी कविता की किताबें 500 और 700 से ज्यादा नहीं बिकतीं, उस दौर में आख़िर मुनव्वर राना की ग़ज़लों में ऐसा क्या है कि वह हिंदी के पाठकों को इस क़दर दीवाना बना रही है? इस सवाल का जवाब उनकी शायरी से गुज़रते हुए बड़ी आसानी से मिल जाता है। उसमें ज़ुबान की सादगी और कशिश इतनी गहरी है कि लगता ही नहीं कि मुनव्वर राना ग़ज़ल कह रहे हैं- वे बस बात कहते-कहते हमारी-आपकी रगों के भीतर का कोई खोया हुआ सोता छू लेते हैं। उनकी शायरी में देसी मुहावरों का जो ठाठ है, बिल्कुल अलग ढंग से खुलता है। मसलन, बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है /न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है।… वो दुश्मन ही सही, आवाज़ दे उसको मोहब्बत से, सलीके से बिठाकर देख, हड़्डी बैठ जाती है।

बरसों पहले हिंदी के मशहूर कवि और ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार ने अपनी इतनी ही मशहूर किताब‘साये की धूप’ की भूमिका में लिखा था कि हिंदी और उर्दू जब अपने-अपने सिंहासनों से उतर कर आम आदमी की ज़ुबान में बात करती हैं तो वे हिंदुस्तानी बन जाती हैं। दरअसल राना की ताकत यही है- वे अपनी भाषा के जल से जैसे हिंदुस्तान के आम जन के पांव पखारते हैं। फिर यह सादगी भाषा की ही नहीं, कथ्य की भी है। उनको पढ़ते हुए छूटते नाते-रिश्ते, टूटती बिरादरियां और घर-परिवार याद आते हैं। मां की उपस्थिति उनकी शायरी में बहुत बड़ी है- अभिधा में भी और व्यंजना में भी- जन्म देने वाली मां भी और प्रतीकात्मक मां भी- लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती / बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती।

ऐसी मिसालें अनगिनत हैं। लगता है मुनव्वर राना को उद्धृत करते चले जाएं- घर, परिवार, सियासत, दुख-दर्द का बयान इतना सादा, इतना मार्मिक, इतना आत्मीय कि हर ग़ज़ल अपनी ही कहानी लगती है, हर बयान अपना ही बयान लगता है- बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है / बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है /…. यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता / मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी मां सजदे में रहती है।../ अमीरी रेशमो किमखाब में नंगी नज़र आई / गरीबी शान से इक टाट के परदे में रहती है।

दरअसल इस सादगी के बीच मुनव्वर एक समाजवादी मुहावरा भी ले आते हैं- राजनीतिक अर्थों में नहीं, मानवीय अर्थों में ही। उनकी ग़ज़लों में गरीबी का अभिमान दिखता है, फ़कीरी की इज़्ज़त दिखती है, ईमान और सादगी के आगे सिजदा दिखता है। हालांकि जब इस मुहावरे को वे सियासत तक ले जाते हैं तो सादाबयानी सपाटबयानी में भी बदल जाती है- मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है / सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है। 

दरअसल यहां समझ में आता है कि मुनव्वर राना ठेठ सियासी मसलों के शायर नहीं हैं, जब वे इन मसलों को उठाते हैं तो जज़्बाती तकरीरों में उलझे दिखाई पड़ते हैं, मां के धागे से मुल्क के मुहावरे तक पहुंचते हैं और देशभक्ति के खेल में भी कहीं-कहीं फंसते हैं। लेकिन उनका इक़बाल कहीं ज़्यादा बड़ा है। वे सियासी सरहदों के आरपार जाकर इंसानी बेदखली की वह कविता रचते हैं जिसकी गूंज बहुत बड़ी है। भारत छोड़कर पाकिस्तान गए लोगों पर केंद्रित उनकी किताब ‘मुहाजिरनामा’ इस लिहाज से एक अनूठी किताब है। कहने को यह किताब उन बेदखल लोगों पर है जो अपनी जड़ों से कट कर पाकिस्तान गए और वहां से हिंदुस्तान को याद करते हैं, लेकिन असल में इसकी जद में वह पूरी तहजीब चली आती है जो इन दिनों अपने भूगोल और इतिहास दोनों से उखड़ी हुई है। यह पूरी किताब एक ही लय में- एक ही बहर पर- लिखा गया महाकाव्य है जिसमें बिछड़ने की, जड़ों से उखड़ने की कसक अपने बहुत गहरे अर्थों में अभिव्यक्त हुई है। किताब जहां से शुरू होती है, वहां मुनव्वर कहते हैं, ‘मुहाजिर हैं, मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं / तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं। आगे कई शेर ऐसे हैं जो दिल को छू लेते हैं, कहानी के ये हिस्सा आज तक सबसे छुपाया है / कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं…./ जवानी से बुढ़ापे तक जिसे संभाला था मां ने / वो फुंकनी छोड़ आए हैं, वो चिमटा छोड़ आए हैं / किसी की आरजू के पांव में ज़ंजीर डाली थी / किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं। यह पूरी किताब अलग से पढ़ने और लिखे जाने लायक है।

बहरहाल, सादगी कविता का इकलौता मोल नहीं होती। उर्दू के ही सबसे बड़े शायर मिर्ज़ा गालिब कहीं से सादाबयानी के शायर नहीं हैं, उनमें अपनी तरह का विडंबना बोध है- ईमां मुझे रोके हैं, खैंचे है मुझे कुफ़्र’ वाली कशमकश, जो शायरी को अलग ऊंचाई देती है। इक़बाल भी बहुत बड़े शायर हैं- लेकिन उनकी भाषा और उनके विषय में अपनी तरह की जटिलता है। बेशक, मीर और फ़िराक देशज ठाठ के शायर हैं, लेकिन उनकी शायरी मायनी के स्तर पर बहुत तहदार है। लेकिन उर्दू में सादगी की एक बड़ी परंपरा रही है जो कई समकालीन शायरों तक दिखती है। फ़ैज़ की ज़्यादातर ग़ज़लें बड़ी सादा जुबान में कही गई हैं। निदा फ़ाज़ली, अहमद फ़राज़, बशीर बद्र अपने ढंग से सादाज़ुबान शायर हैं और बेहद लोकप्रिय भी। लेकिन मुनव्वर राना इस सादगी को कुछ और साधते हैं। उनकी परंपरा कुछ हद तक नासिर काज़मी की ‘पहली बारिश’ से जुड़ती दिखती है। लेकिन नासिर की फिक्रें और भी हैं, उनके फन दूसरी तरह के भी हैं। एक स्तर पर मुनव्वर अदम गोंडवी के भी क़रीब दिखते हैं, ख़ासकर जब वो राजनीतिक शायरी कर रहे होते हैं। लेकिन अदम में जो तीखापन है, उसको कहीं-कहीं छूते हुए भी मुनव्वर उससे अलग, उससे बाहर हो जाते हैं।

उर्दू की इस परंपरा को पढ़ते हुए मुझे हिंदी के वे कई कवि याद आते हैं जो अपने शिल्प में कहीं ज़्यादा चौकस, अपने कथ्य में कहीं ज़्यादा गहन और अपनी दृष्टि में कहीं ज़्यादा वैश्विक हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, वे अपने समाज के कवि नहीं हो पाए हैं। अक्सर यह सवाल मेरे भीतर सिर उठाता है कि क्या यह कहीं शिल्प की सीमा है जो हिंदी कवि को उसके पाठक से दूर करती है?आखिर इसी भाषा में रचते हुए नागार्जुन जनकवि होते हैं, भवानी प्रसाद मिश्र दूर-दूर तक सुने जाते हैं, दुष्यंत भरपूर उद्धृत किए जाते हैं और हरिवंश राय बच्चन और रामधारी सिंह दिनकर तक खूब पढ़े जाते हैं। अचानक ये सारे उदाहरण छंदोबद्ध कविता के पक्ष में जाते दिखते हैं, लेकिन मेरी मुराद यह नहीं है। मेरा कहना बस इतना है कि हिंदी कविता को अपना एक मुहावरा बनाना होगा जो उसके पाठकों तक उसे ले जाए। ये एक बड़ी चुनौती है कि हिंदी कविता की अपनी उत्कृष्टता और बहुपरतीयता को बचाए रखते हुए यह काम कैसे किया जाए।

Source: http://www.jankipul.com/2014/12/blog-post_20.html

jankipul


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A safer place for women- How?


With reference to several articles on the recent ‘Uber’ incidence, don’t we think we have reached a stage where we just debate the consequences without doing some groundwork to prevent the unfortunate happenings. If our society is so dominated by male-chauvinism, with our full realisation, did we ever take any step to make it moderate and civilized!

Unfortunately, NO. Its not that we are suddenly realizing these evils. They were always there. It has been in recent decades that the media takes upon these topics and has been successful in creating some awareness. Woman commission has always been there, schools, teachers parents clergy, priests, bollywood and all the proponents of good and correct path were always there. Why didn’t then we teach our children the true values. One may argue that moral education classes in schools is a waste of time. How can it be if taken through correct discourse? Moral education as curriculum and inculcating moral values are two different things.
As we teach our children not to steal money or rob people of their belongings but help the blind cross the road, we have to teach them to respect women and their body and to understand that a woman’s no means NO. Here we have a general notion that there is a yes even in a girl’s no (Remember, Ladki ki naa me bhi haan hoti hai?). I myself have joked over this many times and i do feel sorry about this. We have to teach our children from an early age that women are not objects/commodities on which betting and ownership can be claimed. Parents, being the first teachers have to take up this responsibility so that the next generation is more civilized and learns to respect women.Jpeg
Charity begins at home. Let’s prevent future embarrassments by investing in today’s children. Empowerment won’t come through media debates but by doing our homeworks!
© 2014 Piyush Kaviraj


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From what to how!!


A new perspective to Story of the Tortoise!! Do read.. Don’t teach what to do and what to ask. Teach how to do and how to ask. Empower people, don’t spoon-feed them!
-Piyush

talesbyCHANG

Newton, Einstein, Edison, Graham Bell, Hooks, etc . Well, most of the famous names which we keep hearing are not Indian.

Every new technology, new successful ideas, new theories- all come from some other country.

We have the richest resources, the best brains, and a competitive manpower but still, we trust imported things and prefer them to the Indian products.

Why ???

Any answer???

 As you all know, when we were children, we came across the story about a rabbit and a tortoise in which tortoise won the race even though it was slow.

Ok that’s nice.

Now if I ask what is the moral of story then I am sure each one of us will say that “slow and steady wins the race”.

Really great, amazing.   Why did it happen that everyone learnt the same moral???

You know why?

Because we were taught so.

For me moral…

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The importance of differences in opinion in the evolution of thought


differences in opinion are to ideological evolution what mutation is to genetics! Nicely put forth.. “Just as mutation is necessary for biological evolution, this difference in perception and interpretation is necessary for ideological evolution”.

Reblogged from: http://triformedlamb.wordpress.com/

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