piyush kaviraj

feelings and musings…

ये बादल, क्यों रूठने लगे हैं?

पहाड़ों  के पत्ते भी , सूखने लगे हैं,
ऐ आसमा! ये बादल, क्यो रूठने लगे हैं?

ख्वाब होगा शायद ; चेहरा खिला हुआ था।
ओस की बूंदों  मे , सूरज मिला हुआ था।
ये अन्धकार सा क्यो, छाने लगा है यारों ?
यू रोशनी के साये , क्यो छूटने लगे हैं?
ऐ आसमा, ये बादल, क्यो रूठने लगे हैं!

एक वक़्त था , उमंगें  , हर ओर से जवाँ  थीं ।
हर गीत मे नशा था, हर ज़िन्दगी यहाँ थीं  ।
वो पल, कहीं  तो ओझल, होने लगा है यारों ;
वो लम्हे नैनों  को, क्यों मून्दने लगे हैं?
ऐ आसमा! ये बादल, क्यों  रूठने लगे हैं!

-पीयूष कुमार.

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